लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के सिमटते जनाधार को बचाने और अपने राजनीतिक वजूद को फिर से स्थापित करने के लिए एक बार फिर से ब्राह्मण समाज पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में जुटी हुई हैं। हालांकि, यह राह इतनी आसान नजर नहीं आ रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान पार्टी के कई दिग्गज और कद्दावर ब्राह्मण नेता एक-एक करके मायावती का साथ छोड़ चुके हैं। हाल ही में अंटू मिश्रा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाना इसी कड़ी की सबसे ताजा घटना है। पिछले एक दशक के भीतर कई ऐसे कद्दावर नेता बसपा से किनारा कर चुके हैं, जिन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 'हाथी' के चुनाव चिह्न के साथ ही की थी। वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए यह कहना बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बसपा की वह सियासी नर्सरी अब धीरे-धीरे अनुभवी ब्राह्मण चेहरों से पूरी तरह खाली होती जा रही है, जिसने कभी पार्टी को फर्श से अर्श तक पहुंचाया था।
साल 2007 की सफल 'सोशल इंजीनियरिंग' और उसके बाद बिखराव
याद दिला दें कि साल 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा ने अपनी करिश्माई रणनीति के तहत 80 से अधिक ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा था, जिनमें से रिकॉर्ड 41 विधायक चुनकर सीधे विधानसभा पहुंचे थे। बसपा की यह अनूठी 'सोशल इंजीनियरिंग' इतनी अधिक सफल रही थी कि राज्य के अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी बाद में इसी तर्ज पर अपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी थी।
मगर समय का पहिया घूमा और साल 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते इन ब्राह्मण नेताओं का बसपा से मोहभंग होने का सिलसिला तेजी से शुरू हो गया। मौजूदा भाजपा सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण हैं। बसपा ने कभी उन्हें संसद में भेजकर बड़ा नेता बनाया था, लेकिन चुनाव ठीक पहले उन्होंने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया, और बाद का उनका राजनीतिक सफर इस बात की गवाही देता है कि उनका यह फैसला उनके भविष्य के लिए बेहद मुफीद साबित हुआ।
एक के बाद एक दिग्गजों ने छोड़ा पार्टी का साथ
ब्रजेश पाठक के अलावा पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने वर्ष 2022 के चुनावों से ठीक पहले बसपा का साथ छोड़कर कांग्रेस पार्टी का रुख कर लिया था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय (अब स्वर्गीय), रंगनाथ मिश्रा, तथा पूर्व विधायक विनय शंकर तिवारी और उनका पूरा राजनीतिक कुनबा भी धीरे-धीरे बसपा से दूर हो गया। विधान परिषद के पूर्व सभापति गणेश शंकर पांडेय समेत सरकार में अहम और उच्च पदों पर आसीन रहे कई अन्य जाने-माने ब्राह्मण नेता भी बदलते वक्त के साथ दूसरे दलों के पाले में चले गए। इसके अलावा अंबेडकरनगर क्षेत्र से बसपा के टिकट पर सांसद और विधायक रह चुके दिग्गज नेता राकेश पांडेय तथा उनके बेटे व पूर्व सांसद रितेश पांडेय भी अब पार्टी से अलग हो चुके हैं।
सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी
अंटू मिश्रा सहित इन सभी प्रमुख और जमीनी ब्राह्मण नेताओं के पार्टी से विदा हो जाने के कारण बसपा की उस रणनीति को बड़ा झटका लगा है, जिसके तहत वह इस बड़े सवर्ण वर्ग को अपने पाले में जोड़ना चाहती थी। वर्तमान में पार्टी के भीतर ब्राह्मण समाज को एकजुट करने और पार्टी से जोड़े रखने की पूरी जिम्मेदारी अकेले राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर आ टिकी है। संगठन के भीतर अब वह इकलौते और सबसे प्रमुख ब्राह्मण चेहरा बचे हैं, जो लंबे समय से पार्टी के 'ब्राह्मण सम्मेलनों' की कमान संभालते आ रहे हैं। इस अभियान में उनके बेटे कपिल मिश्रा और परिवार के अन्य सदस्य भी लगातार सहयोग करते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 के सियासी समीकरणों से भी बहुत पहले से सतीश चंद्र मिश्रा के कई परिजन बसपा संगठन से जुड़कर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे का मुकदमा और रणनीतिक कदम
ब्राह्मण वर्ग का टूटा हुआ भरोसा वापस पाने और उनका राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए बसपा ने कानपुर के चर्चित 'बिकरू कांड' की आरोपी रही खुशी दुबे की कानूनी पैरवी और मदद करने की दिशा में भी कवायद की थी। इसके साथ ही वर्ष 2021 में पार्टी ने बड़े पैमाने पर ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन किया था। पार्टी सुप्रीमो मायावती भी समय-समय पर सत्तारूढ़ भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा करने का आरोप लगाती रही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बसपा ने अपने शुरुआती उम्मीदवारों में भी सबसे पहले एक ब्राह्मण चेहरे को ही मैदान में उतारा है और इसके बाद सादाबाद सीट से भी ब्राह्मण प्रत्याशी के नाम का आधिकारिक ऐलान किया गया है। हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद दूसरे दलों के अन्य बड़े और प्रभावशाली ब्राह्मण नेता अब बसपा के पाले में आने से साफ कतराते नजर आ रहे हैं।
अंटू मिश्रा के भाजपा दफ्तर जाने पर मचा था सियासी बवाल
दलगत राजनीति में चर्चा का विषय बने अंटू मिश्रा से जुड़ा एक अन्य वाकया भी काफी सुर्खियों में रहा था। करीब दो साल पहले अंटू मिश्रा अचानक लखनऊ स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय जा पहुंचे थे, जिसके बाद राज्य की राजनीतिक गलियारों में भारी हड़कंप मच गया था। वह मार्च 2024 में भाजपा की आधिकारिक सदस्यता ग्रहण करने वाले बसपा के ही एक अन्य नेता के साथ वहां पहुंचे थे, हालांकि उन्हें उस दौरान पार्टी की सदस्यता नहीं दिलाई गई थी। उस वक्त भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने यह बयान दिया था कि अंटू मिश्रा को बाद में दिल्ली में पार्टी की सदस्यता दिलाई जाएगी, लेकिन अंततः उन्हें भाजपा में शामिल किए जाने का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।





