नई दिल्ली। संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में भारी हंगामे के बीच 'केरल' का नाम बदलकर 'केरलम' करने से संबंधित संशोधन विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया है। 'केरल (नाम में परिवर्तन) विधेयक, 2026' का मुख्य उद्देश्य भारतीय संविधान की पहली अनुसूची में दर्ज राज्य के अंग्रेजी नाम 'केरल' को आधिकारिक रूप से बदलकर स्थानीय भाषा के अनुसार 'केरलम' करना है।

केरल विधानसभा का प्रस्ताव और भाषाई आधार

राज्य का नाम बदलने की यह कवायद केरल की ऐतिहासिक और भाषाई पहचान से जुड़ी हुई है:

  • विधानसभा की सर्वसम्मत मांग: जून 2024 में केरल विधानसभा ने दूसरी बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम 'केरलम' करने की मांग की थी। इससे पहले अगस्त 2023 में भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया गया था।

  • मलयालम भाषा में पहचान: राज्य सरकार का तर्क है कि मलयालम भाषा में इस भूभाग को हमेशा से 'केरलम' ही कहा जाता रहा है, जबकि संविधान की पहली अनुसूची और आधिकारिक अंग्रेजी दस्तावेजों में यह नाम 'केरल' के रूप में दर्ज था।

'केरलम' नाम की ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ें

'केरलम' शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं:

  • अशोक के शिलालेख में जिक्र: इस नाम का सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण 257 ईसा पूर्व के सम्राट अशोक के दूसरे शिलालेख में प्राप्त होता है। इसमें दक्षिण के शासकों के संदर्भ में 'केरलपुत्र' शब्द दर्ज है, जिसका अर्थ 'केरल का पुत्र' यानी चेर राजवंश से है।

  • भाषाई विश्लेषण: प्रसिद्ध भाषाविद हरमन गुंडर्ट के अनुसार, यह नाम कन्नड़ के 'केरम' या 'चेरम' शब्द से जुड़ा है, जो गोकर्ण से कन्याकुमारी तक के तटीय क्षेत्र को दर्शाता है। वहीं, अन्य मान्यता के अनुसार यह तमिल मूल के 'चेर' (जुड़ना) और 'अलम' (भूमि) के संयोग से बना है।

केरल राज्य के गठन का इतिहास

1920 के दशक में शुरू हुए 'ऐक्य केरल' आंदोलन ने मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। आजादी के बाद 1949 में त्रावणकोर और कोचीन का विलय हुआ। इसके उपरांत, सैयद फजल अली की अध्यक्षता वाले 'राज्य पुनर्गठन आयोग' की सिफारिशों पर 1 नवंबर 1956 को मालाबार और कासरगोड को जोड़कर आधुनिक राज्य का गठन किया गया, जिसे स्थानीय तौर पर 'केरलम' ही पुकारा जाता था।

राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को राज्यों के नाम और सीमाओं में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है:

  • राष्ट्रपति की पूर्व सहमति: इस प्रकार का विधेयक केवल राष्ट्रपति की अनुसंशा पर ही संसद में लाया जा सकता है।

  • राज्य विधानसभा का परामर्श: राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य की विधानसभा को विचार-विमर्श हेतु विधेयक भेजा जाता है, हालांकि राज्य की राय संसद के निर्णय पर बाध्यकारी नहीं होती।

  • वर्तमान स्थिति: फरवरी 2026 में केंद्रीय कैबिनेट और तत्पश्चात राज्य विधानसभा की मंजूरी के बाद यह विधेयक 10 अगस्त को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और 11 अगस्त को पारित हुआ। अब कानून का रूप लेने के लिए इसे राज्यसभा की स्वीकृति और राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर की आवश्यकता होगी।