अरावली की वादियों के बीच हिल स्टेशन आबूराज में पहाड़ों और जंगल के बीच एक प्राचीन गुफा ऐसी भी है, जिसका जुड़ाव पांडवों से है. जी हां, माउंट आबू की एक गुफा को महाभारत के पांडवों के नाम से पहचाना जाता है. यहां बने मंदिर में एक ही स्थान पर पांच शिवलिंग की पूजा होती है. हम बात कर रहे हैं देलवाड़ा की पांडव गुफा की. स्थानीय भक्तों की मान्यता है कि महाभारत काल में जब पांडव अज्ञातवास में थे, तब उन्होंने माता कुंती के साथ इस स्थान पर समय बिताया था.
यहां एक गुफा में पांडव पांच शिवलिंग की पूजा करते थे. गुफा के पास बने एक झरने के किनारे बने छोटे से मंदिर में आज भी पांच शिवलिंग की पूजा होती है. इस मंदिर के छत के भाग में पूरी गुफा ही नजर आती है. स्थानीय भक्त नीरज सिंह ने बताया कि ये मंदिर क्षेत्र में आस्था का केंद्र है. यहां पांडव गुफा के पास ही गुफा के दूसरे हिस्से में माता चामुंडा का मंदिर बना हुआ है.
माता कुंती यहां शक्ति की उपासना करती थी
मान्यता है कि इस स्थान पर माता कुंती निवास करती थी और शक्ति की उपासना करती थी. इसके अलावा पास में बने हनुमान मंदिर में एक विशाल चट्टान पर हनुमान जी की छवि नजर आती है. बारिश के समय में यहां मंदिर परिसर से बहता झरना और चारों तरफ हरियाली के बीच शांति का अहसास होता है. वर्षों तक ये मंदिर जंगल में छुपा हुआ था. कुछ दशक पहले महंत रत्नगिरी महराज के यहां आने के बाद इस स्थान को मंदिर के रूप में जीर्णोद्धार करवाया गया.
मंदिर परिसर में महंत की समाधि और प्रतिमा भी स्थापित है
अब माउंट आबू के अलावा देश के कोने कोने से लोग इस गुफा को देखने और पांच शिवलिंग के दर्शन करने आते है. मंदिर परिसर में महंत रत्नगिरी महराज की समाधि और प्रतिमा भी स्थापित है. यहां कई संत तपस्या करने आते है. शाम के बाद भक्त यहां नहीं आते है, क्योंकि जंगल क्षेत्र होने से रात में भालू, लेपर्ड और जंगली जानवरों का खतरा रहता है. कई बार शाम और अलसुबाह मंदिर परिसर में जंगली जानवर भी घूमते दिखाई दे जाते हैं.





