पहली ही बारिश में खुल गई करोड़ों के प्रोजेक्ट की पोल
आगरा :
बारिश की बूंदों ने ताजगंज प्रोजेक्ट के बड़े खेल की पोल खोलकर रख दी। धांधली की नींव पर खड़ा हो रहा ताजगंज प्रोजेक्ट दरक गया। शिल्पग्राम से लेकर ताजमहल के पूर्वी गेट तक और पश्चिमी गेट से अमरूद टीला पार्किंग तक प्रोजेक्ट के तहत कराए गए सैंड स्टोन, कॉबल स्टोन मिट्टी में धंस गए। कहीं, डक्ट के पास की मिट्टी दरक गई तो कहीं फुटपाथ के पत्थर ही नीचे धंस गए।
पोल खुलने के डर से आनन-फानन में मिट्टी डालकर प्रोजेक्ट के कामों को ठीक दिखाने का प्रयास किया गया, लेकिन तब तक कई सैलानी इसे अपने कैमरे में रिकार्ड कर चुके थे। जिस तरह से आगरा पर मानसून मेहरबान है, ठीक उसी तरह सत्ता के करीबी ठेकेदार फर्म पर अफसर मेहरबान हैं। इसीलिए एक साल से ताजमहल के पास ताजगंज प्रोजेक्ट की खामियां किसी को नजर नहीं आईं।  बल्कि ताजगंज प्रोजेक्ट का बजट 167 करोड़ से 50 करोड़ रुपए बढ़ाकर 217 करोड़ रुपये कर दिया गया।

बसपा की तरह सपा पर उठीं अंगुलियां
सत्ता में आने से पहले समाजवादी पार्टी ने बसपा शासन में बने पार्क और मूर्तियों पर हुए खर्च को चुनावी मुद्दा बनाया था। तब बसपा पर हमलावर रही सपा लाल पत्थर से बनाए गए दलित नेताओं के स्मारकों पर बेहिसाब खर्च पर सवाल खड़ा करती रही थी। ताजमहल के पास ताजगंज प्रोजेक्ट में जिस तरह से 136 करोड़ से बढ़ाकर 217 करोड़ रुपये लागत पहुंचाई गई है, उससे बसपा ने समाजवादी पार्टी पर उसी के लहजे में हमले करने शुरू कर दिए हैं। बसपा के जोनल कार्डिनेटर सुनील कुमार चित्तौड़ सपा के सत्ता में आने पर सबसे पहले ताजगंज प्रोजेक्ट की जांच कराने का एलान कर चुके हैं। सत्ता के करीबियों, रिश्तेदारों की मौजूदगी से ताजगंज प्रोजेक्ट पर विरोधी दलों को अंगुली उठाने का मौका भी मिल गया है।

नॉन टेक्निकल अफसर कर रहे जांच
217 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिए गए ताजगंज प्रोजेक्ट में राज कारपोरेशन किस दर्जे का काम कर रही है, इसकी जांच वह अफसर कर रहे हैं, जिन्हें सिविल इंजीनियरिंग का तकनीकी ज्ञान ही नहीं है। एक साल से ताजगंज प्रोजेक्ट में डक्ट, फुटपाथ, लाइटें, स्टोन रोड बनाने की कवायद चल रही है। इसके तकनीकी पहलू की जांच अधिकारी नहीं कर पा रहे।