बिलासपुर। ऋण वसूली प्रकरण में एक मकान का भौतिक कब्जा लेने पहुँचे बैंक अफसरों और पुलिस टीम को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) के बाद खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता मिर्जा शौकत बेग की याचिका पर प्राथमिक सुनवाई करते हुए निर्धारित शर्तों के अधीन बेदखली की कार्रवाई पर तात्कालिक रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय ने इस मामले में बैंक प्रबंधन सहित अन्य संबंधित पक्षकारों को औपचारिक नोटिस प्रेषित कर जवाब तलब किया है, जिसकी अगली सुनवाई आगामी तेईस नवंबर को तय की गई है।

ऋण अदायगी और बेदखली वारंट से जुड़ा पूरा प्रकरण

मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अपने परिजनों के साथ मिलकर डीसीबी बैंक से लगभग साढ़े तेरा लाख रुपये का वित्तीय ऋण लिया था, जिसके एवज में तालापारा स्थित एक हजार बीस वर्गफुट के आवासीय मकान को बंधक रखा गया था। किस्तों के भुगतान में अनियमितता होने पर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बिलासपुर के आदेश पर नायब तहसीलदार कार्यालय से बेदखली का वारंट जारी कराया गया था। याचिकाकर्ता ने इस कार्रवाई के खिलाफ ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) जबलपुर का दरवाजा खटखटाया था, जहाँ निर्धारित राशि जमा करने की शर्त पर कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।

न्यायाधिकरण में मामला लंबित रहने के बावजूद बैंक की कार्रवाई

याचिकाकर्ता का आरोप है कि डीआरटी में मामला लंबित रहने और निर्धारित किस्त जमा कर दिए जाने के बावजूद बैंक अधिकारियों ने पुलिस बल को साथ लेकर आठ अक्टूबर को मकान का जबरन कब्जा लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके विरोध में अधिवक्ता अब्दुल वहाब खान के माध्यम से हाईकोर्ट में आपातकालीन याचिका दायर की गई। उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बेदखली की कार्रवाई पर तुरंत रोक लगा दी। दोपहर में जैसे ही अदालत के स्थगन आदेश की प्रति मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों और बैंक प्रबंधन को सौंपी गई, उन्हें कब्जा लेने की कार्रवाई स्थगित कर वापस जाना पड़ा।