विक्टोरिया: हिंद महासागर के रणनीतिक कूटनीतिक पटल पर एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां भारत ने इस समुद्री क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए अपनी सामरिक चालों को और आक्रामक कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी महत्वाकांक्षी और नई रणनीतिक योजना 'विजन महासागर' के तहत सेशेल्स पहुंचे हैं। सेशेल्स को पश्चिमी हिंद महासागर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय खिलाड़ी माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र के छोटे द्वीपीय देशों को भारी कर्ज के जाल में फंसाकर वहां अपने सैन्य ठिकाने स्थापित करने की नीति अपनाई थी, जिसका उदाहरण श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट है। लेकिन भारत ने ऐन वक्त पर सेशेल्स के साथ अपने रक्षा और कूटनीतिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाकर चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (मोतियों की माला) प्लान को करारा झटका दिया है। अब इस व्यस्ततम समुद्री मार्ग पर भारत और सेशेल्स मिलकर चौबीसों घंटे संयुक्त पेट्रोलिंग और निगरानी करेंगे, जिससे चीन की एकतरफा मनमानी पर पूरी तरह से अंकुश लग जाएगा। हाल ही में मालदीव के रुख में आए बदलाव और उसके दोबारा चीनी खेमे की तरफ झुकाव के बाद भारत के लिए सेशेल्स की अहमियत सामरिक रूप से कहीं अधिक बढ़ गई है। यही कारण है कि दिल्ली से प्रस्थान करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने सेशेल्स को भारत का एक अमूल्य समुद्री पड़ोसी और ग्लोबल साउथ को एकजुट करने का सबसे मजबूत स्तंभ बताया।
नक्शे पर छोटी बिंदी, मगर कूटनीति का किंगमेकर
भौगोलिक आकार में भले ही सेशेल्स एक छोटे द्वीप जैसा दिखाई देता हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के मार्ग पर इसकी अवस्थिति इसे हिंद महासागर का सबसे बड़ा 'किंगमेकर' बनाती है। यह देश दुनिया के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों के ठीक मुहाने पर एक सजग पहरेदार की तरह स्थित है, जहां से वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन कहे जाने वाले विशाल तेल टैंकर और व्यापारिक जहाज गुजरते हैं। इस मार्ग में पैदा होने वाला कोई भी अवरोध आधी दुनिया की आर्थिक रफ्तार को ठप कर सकता है। भारत ने इस कूटनीतिक संवेदनशीलता को भांपते हुए सेशेल्स को अपनी महासागर नीति के केंद्र में रखा है। इसके जरिए भारत न केवल इस समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित रख रहा है, बल्कि चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार हो रहे ग्लोबल साउथ के गरीब और छोटे देशों की आवाज को भी मजबूती दे रहा है। हिंद महासागर में 'नेट सुरक्षा प्रदाता' (नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर) की भूमिका निभा रहा भारत, सेशेल्स के साथ मिलकर समुद्री डकैती, नशीले पदार्थों की तस्करी और अवैध शिकार के खिलाफ साझा अभियान चला रहा है। भारत ने सेशेल्स के विभिन्न द्वीपों पर 'कोस्टल सर्विलांस रडार स्टेशनों' का एक अभेद्य जाल बिछाया है, जो समंदर में भारत के 'तीसरे नेत्र' की तरह काम करते हुए चीनी नौसेना की हर संदिग्ध हलचल पर बारीक नजर रख रहे हैं।
सागर नीति से 'विजन महासागर' तक का सफर
साल 2015 में अपनी पहली सेशेल्स यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने 'सागर' (SAGAR) नीति का एलान किया था, जिसने भारत की समुद्री कूटनीति की नींव रखी थी। हालांकि, बीते 11 वर्षों में चीन की ओर से बढ़ते सामरिक खतरों को देखते हुए भारत ने अपनी रणनीति का दायरा बढ़ाते हुए इसे अब 'विजन महासागर' का रूप दे दिया है। इसके तहत सेशेल्स अब केवल भारत का विकास साझीदार नहीं, बल्कि हिंद महासागर में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने वाला एक बराबर का रणनीतिक हिस्सेदार बन चुका है। भारत ने सेशेल्स के साथ खुफिया जानकारी साझा करने (इंटेलिजेंस शेयरिंग) और सैन्य सहयोग को इस हद तक मजबूत कर दिया है कि चीन के लिए अब इस इलाके में पैर पसारना लगभग नामुमकिन हो गया है। दोनों देशों की यह गहरी दोस्ती पश्चिमी हिंद महासागर में नई दिल्ली की सामरिक ताकत को एक अजेय किले में तब्दील करती है।
आर्थिक और ढांचागत सहयोग से जीतीं दिल की दूरियां
भारत और सेशेल्स का यह अटूट रिश्ता केवल सैन्य रडार और सुरक्षा सहयोग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत ने यहां के सामाजिक विकास में भी अभूतपूर्व योगदान दिया है। इसी वर्ष फरवरी 2026 में जब सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी भारत के आधिकारिक दौरे पर आए थे, तब नई दिल्ली ने सेशेल्स के लिए 175 मिलियन डॉलर (करीब 1450 करोड़ रुपये) के एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। इस वित्तीय मदद के जरिए सेशेल्स में किफायती आवास, स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण और डिजिटल गवर्नेंस जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। इसके अलावा, सेशेल्स की भव्य मजिस्ट्रेट कोर्ट की इमारत और वहां की शानदार नेशनल असेंबली की बिल्डिंग भी भारत के वित्तीय सहयोग और दोस्ती की जीती-जागती मिसाल हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से विरोधी खेमों में भारी हलचल है, क्योंकि भारत ने विकास और सुरक्षा के अपने बेहतरीन संतुलन से चीन को इस महासागरीय बिसात पर काफी पीछे छोड़ दिया है।





