आजादी के बाद से ही देश में जातीय जनगणना की मांग उठती रही है. लेकिन पिछले कुछ सालों से ये मांग तेज हो गई. जातीय जनगणना की मांग खासकर विपक्षी पार्टियां उठा रही हैं. उनकी मांग है कि केंद्र सरकार पूरे देश में जातीय जनगणना कराए और 'जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी' के फार्मूले पर योजनाएं बनाई और चलाई जाएं. इस मांग को तब और बल मिला जब साल 2023 में बिहार सरकार ने अपने राज्य में जातीय गणना करा ली. अभी हाल ही में तेलंगाना सरकार ने भी प्रदेश में जातीय गणना कराकर उसके आंकड़े सार्वजनिक कर दिए. बता दें कि देश में आखिरी जातीय जनगणना बरतानिया हुकूमत के दौरान साल 1931 में हुई थी.

बीते लोकसभा चुनाव में जातीय जनगणना था प्रमुख मुद्दा
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' का जातीय जनगणना एक प्रमुख मुद्दा था. विपक्षी दलों ने इसको अपने घोषणा पत्र में भी शामिल किया था और कहा था कि अगर इंडिया गठबंधन की सरकार बनेगी तो पूरे देश में जातीय जनगणना कराई जाएगी. हालांकि विपक्ष को चुनाव में जीत नहीं मिली. जातीय गणना की मांग लगातार उठती रहती है. वहीं, इसका विरोध करने वाले कहते हैं जातीय गणना से समाज में फूट आ जाएगी, आपसी मतभेद पैदा हो जाएगा. बाबा बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. धीरेंद्र शास्त्री का कहना है कि जातिगत जनगणना देश को बांटने वाला विषय है. उन्होंने इसके बजाय अमीरी गरीबी की गणना पर जोर दिया.

'देश में अमीर गरीब की गणना होनी चाहिए'
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा "जनगणना का मूल उद्देश्य यह देखना होना चाहिए कि देश में कितने अस्पताल, स्कूल और पुलिस थाने की जरूरत है, न कि समाज को जातियों के आधार पर बांटना." उन्होंने कहा, "हम किसी भी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं हैं, लेकिन हमें नहीं लगता कि जातिगत जनगणना देश के लिए जरूरी है. इसके बजाय, हमें अपनी ऊर्जा देश के समग्र विकास में लगानी चाहिए."उन्होंने सुझाव देते हुए कहा, "देश में अमीर और गरीब की गणना होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितने लोग संपन्न हैं और कितने लोग आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. यदि इस आधार पर योजनाएं बनाई जाएं, तो गरीबी कम करने, बेरोजगारी दूर करने और युवाओं का विदेशों में पलायन रोकने में मदद मिलेगी." बाबा बागेश्वर ने ये भी कहा, "वह जातियों को मिटाने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि जातीय भेदभाव को कम करने और एकजुटता बढ़ाने की बात कर रहे हैं."

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी किया था विरोध
भारत में जातीय गणना की मांग कोई नई बात नहीं है. देश की आजादी के बाद पहली बार 1951 में हुई जनगणना में भी जातीय गणना की मांग उठी थी. तब भी इसका विरोध हुआ था. तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ये कहते हुए इस मांग का विरोध किया था कि जातीय जनगणना कराने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है. इसके बाद साल 2011 की जनगणना में सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना हुई, लेकिन सरकार ने जातिगत आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया. 1931 में हुई जातीय गणना के आधार पर 1990 में लागू हुए मंडल कमीशन में ओबीसी को 27 फीसदी का आरक्षण दिया गया. हालांकि सरकार एससी-एसटी की गणना कराती है, लेकिन 1931 के बाद से ओबीसी की गणना नहीं हुई है.

आजादी के बाद बदल गया जनगणना का पैटर्न
साल 1872 से 1931 तक जितनी बार जनगणना हुई, उसमें जातिवार आंकड़े भी दर्ज किए गए. 1901 में जातीय जनगणना हुई तो 1,646 अलग-अलग जातियों की पहचान की गई. उसके बाद 1931 में यह संख्या बढ़कर 4,147 हो गई. 1941 में भी जाति जनगणना हुई, लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए. आजादी के बाद 1951 में जब पहली जनगणना हुई तो ब्रिटिश शासन वाली जनगणना के तरीके में बदलाव कर दिया गया और जातिगत आंकड़ों को सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित कर दिया गया. यानी OBC और दूसरी जातियों का डेटा नहीं दिया जा रहा है. जनगणना का ये ही स्वरूप कमोबेश अभी तक चला आ रहा है.


जातीय जनगणना क्यों उठ रही है मांग?
जातीय जनगणना की मांग उठने के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख हैं: सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन, आरक्षण की सही गणना और वंचित वर्गों के लिए योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन. जातिगत जनगणना से समाज के विभिन्न वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सटीक आकलन करने में मदद मिलती है, जिससे सरकार को उचित नीतियां बनाने में मदद मिलती है.जातिगत जनगणना से विभिन्न जातियों की जनसंख्या का पता चलता है, जिससे आरक्षण के कोटा को सही ढंग से निर्धारित करने में मदद मिलती है. जातीय गणना से वंचित वर्गों की पहचान करने में मदद मिलती है, जिससे सरकार को उनके लिए विशेष योजनाएं बनाने और लागू करने में मदद मिलती है. इसलिए पिछड़ी जातियों के हिमायती दल जातीय जनगणना की मांग तेजी से उठा रहे हैं.

जातिगत जनगणना क्या है?
जातिगत जनगणना का अर्थ है जनगणना की कवायद में भारत की जनसंख्या का जातिवार सारणीकरण शामिल करना. भारत ने केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के 1951 से 2011 तक जातिगत आंकड़ों को गिना और प्रकाशित किया है. यह धर्मों, भाषाओं और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित डेटा भी प्रकाशित करता है. हालांकि, जातीय जनगणना की मांग के राजनीतिक निहितार्थ से भी इनकार नहीं किया जा सकता.